पहले जानिए अपनी जड़ें — महाकथा, वंश और भक्ति। फिर पढ़िए हमारी सेवा की कथा।
हिंदी हृदयभूमि और दक्षिण भारत में फैले चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की उत्पत्ति, महिमा और परंपरा — पुराणों और इतिहास की दृष्टि से।
भारत में कायस्थ समाज को मुख्यतः तीन क्षेत्रीय समुदायों में देखा जाता है — चित्रगुप्तवंशी (हिंदी हृदयभूमि व दक्षिण), चंद्रसेनिया (महाराष्ट्र-गुजरात) और चित्रसेनिया (पूर्वी भारत)। सभी लेखक वर्ग की परंपरा साझा करते हैं, किंतु भाषा और क्षेत्रीय रीति भिन्न हो सकती है।
बिहार में हम मुख्यतः चित्रगुप्तवंशी परंपरा में हैं — जहाँ भगवान श्री चित्रगुप्त जी कुलदेव और आदिपुरुष माने जाते हैं।
यमराज के समक्ष 84 लाख योनियों के प्राणियों के कर्मों का लेखा असंभव प्रतीत हुआ। ब्रह्मा जी ने दीर्घ ध्यान किया — और जब नेत्र खुले, तो उनकी समग्र काया से एक तेजस्वी, चतुर्भुज, महाबल देव प्रकट हुए।
चूँकि वे ब्रह्मा की काया में गुप्त थे, नाम पड़ा चित्रगुप्त — और उनके वंशज कायस्थ (काया + स्थ), अर्थात् ब्रह्मकायोत्पन्न।
चित्रगुप्त जी की मूर्ति में चार प्रतीक दिखते हैं — अभय मुद्रा (शांति), कलम (लेखन-विद्या), वेद (ज्ञान) और खड्ग (न्याय)। ये चार ही कायस्थ परंपरा के आधार माने जाते हैं।
कलम से लेखन, वेद से ज्ञान, खड्ग से न्याय — और शांति से कर्म। यही कारण है कि कायस्थ परिवारों में विद्या और धर्म दोनों का सम्मान रहा है।
चैत्र शुक्ल द्वितीया (प्रकट दिवस) — उज्जैन के कायथा ग्राम में भगवान का प्रकट होना। चैत्र मास को कई स्थानों पर चित्रमास कहा जाता है।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया (यम द्वितीया) — दीपावली के बाद कलम-दवात पूजा। नई कलम से "श्री चित्रगुप्ताय नमः" लिखकर वर्षारंभ — यह परंपरा आज भी बिहार के हर चित्रांश घर में जीवित है।
इरावती से आठ और दक्षिणा (नंदिनी) से चार पुत्र — कुल बारह। प्रत्येक को ऋषियों के पास शिक्षा हेतु भेजा गया; वे विभिन्न दिशाओं में बसकर कायस्थ समाज की शाखाएँ बने।
नीचे बारह वंश अनुभाग में प्रत्येक शाखा का विस्तार देखें — क्लिक करके विवरण खोलें।
चित्रगुप्तवंशी कायस्थ मुख्यतः 21 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में पाए जाते हैं — उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि।
दक्षिण में कर्णम, करुणीगर, मुदलियार नामों से भी इन्हीं परंपराओं के समुदाय दर्ज हैं — सभी चित्रगुप्त को कुलदेव मानते हैं।
पौराणिक वंशावली के अनुसार भगवान श्री चित्रगुप्त के बारह पुत्र — और उनसे उत्पन्न बारह कायस्थ शाखाएँ। नीचे किसी भी वंश पर क्लिक करें।
📚 स्रोत: Kayasth Encyclopedia — Grand Narrative · विभिन्न पुराणों में नाम-क्रम में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
पूजा, यम द्वितीया और दावात पूजन के लिए — वेबसाइट रीडर में पढ़ें।
एक दिव्य प्रेरणा से जन्मी सेवा की कहानी — फाउंडेशन की स्थापना से आज तक।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की काया से भगवान श्री चित्रगुप्त का प्राकट्य हुआ — इसीलिए उन्हें "कायस्थ" कहा गया। उन्हें धर्मराज के सहायक के रूप में समस्त प्राणियों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का दायित्व मिला।
उनके हाथ में कलम और दवात — यह केवल प्रतीक नहीं, एक संदेश है: हर कर्म लिखा जाता है, इसलिए हर कर्म ऐसा हो जो लिखे जाने योग्य हो। न्याय, ईमानदारी, विद्या और सेवा — यही श्री चित्रगुप्त जी की शिक्षा है।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज) के दिन चित्रगुप्त पूजा / कलम-दवात पूजा का विशेष महत्व है, जब कलम की पूजा कर ज्ञान और न्याय के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया जाता है।
एक छोटे संकल्प से बिहार-व्यापी संगठन तक
श्री चित्रगुप्त जी की प्रेरणा से कुछ समर्पित लोगों ने मिलकर इस फाउंडेशन की नींव रखी — उद्देश्य था समाज के हर वर्ग तक सेवा पहुँचाना।
धीरे-धीरे संगठन बिहार के सभी 38 जिलों में फैला। हर जिले में प्रमुख व उपप्रमुख नियुक्त हुए और शहर-गाँव स्तर तक सदस्य जुड़े।
शिक्षा सहयोग, स्वास्थ्य शिविर, रक्तदान, विवाह सहयोग, आपदा राहत और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से निरंतर सेवा जारी है।
हर गाँव तक संगठन, हर जरूरतमंद तक सहायता, और नई पीढ़ी तक संस्कार — यही हमारा अगला अध्याय है।
हर कार्य में पारदर्शिता और निष्पक्षता।
शिक्षा और ज्ञान का प्रसार सर्वोच्च प्राथमिकता।
निःस्वार्थ भाव से समाज के हर वर्ग की सेवा।
परंपरा और संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन।